रिव्यु: गुलमोहर परिवार के पतझड़ की कहानी लोग डाल के पत्तों की तरह टूट रहे हैं, घर बिखर रहा है

कभी कभी लगता है कि एक ही घर में रहते हैं, फिर भी कोई किसी को नहीं जानता.’ ‘मम्मीजी ने घर बेच दिया, बेटा साथ नहीं रहना चाहता.’ ‘दो मंजिलों का घर तो बन गया, कमरे भी बड़े बन गए, पर इस एक घर में न जाने कब हम सबने अपने-अपने कमरों में खुद के घर बना लिए.’ डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज हुई करीब दो घंटे दस मिनिट की फिल्म गुलमोहर के ये तीन डायलॉग आप ट्रेलर में मनोज बाजपेयी के मुंह से सुन सकते है. इनमें आप गुलमोहर की समस्या को समझ सकते हैं. पूरी कहानी इसी के आस-पास बुनी है. एक रईस बत्रा परिवार, जिसके पास जीवन की सारी मूलभूत सुविधाएं और संपन्नता है, परिवार बिखर रहा हैl गुलमोहर एक बड़ा दो मंजिला बंगला है. जहां बत्रा परिवार रहता है. परिवार की मुखिया कुसुम बत्रा (शर्मीला टैगोर) हैं. उनके पति को गुजरे कुछ बरस हो चुके हैं. उनका 55 साल का बेटा अरुण बत्रा (मनोज बाजपेयी), उसकी पत्नी इंदिरा (सिमरन). दोनों का बेटा आदित्य (सूरज शर्मा) बहू दिव्या (कावेरी सेठ) और बेटी अमृता (उत्सवी झा). सब गुलमोहर में रहते हैं. आदित्य अपना स्टार्टअप शुरू करने के लिए स्ट्रगल कर रहा है और दिव्या अच्छी नौकरी में है. अमृता गीत लिखती और एक रिलेशनशिप में है. जब सारा परिवार एकजुट दिख रहा होता कि तभी पता चलता है कि श्रीमती कुसुम बत्रा ने यह घर बेचने का फैसला कर लिया है. वह खुद अब पांडिचेरी में जाकर बसेंगी. उधर आदित्य पिता से अलग रहने का फैसला करता है. वह आत्मनिर्भर होना चाहता है और अपने रईस पिता से उसे कोई मदद नहीं चाहिए l गुलमोहर की कहानी में और भी पात्र हैं. कुसुम बत्रा के देवर सुधाकर बत्रा (अमोल पालेकर) और उनका परिवार. गुलमोहर में काम करने वाली नौकरानी रेशमा और गार्ड जितेंद्र कुमार (जतिन गोस्वामी). सुधाकर जहां कुसुम से पुराने पारिवारिक कारणों से नाराज, कुछ खलनायकी वाले अंदाज में निकलकर आते हैं, तो रेशमा और जितेंद्र इस बिखरते परिवार की कहानी में लवस्टोरी बुनते हैं. इन बातों के बीच कुसुम चाहती हैं कि इस घर को छोड़ने से पहले परिवार यहां आखिरी बार होली मनाए क्योंकि हर साल वे यह त्यौहार जोर-शोर से मनाते रहे हैं. तभी एक पुराना राज अरुण और इंदिरा के सामने उजागर होता है. वह इसे सबके सामने रखते हैं और बिखराव के मोड़ पर खड़े परिवार में नई हलचल पैदा हो जाती है l

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