उत्तर प्रदेश l जब कोई व्यक्ति अपना घर बनाता है, तो उसमें सिर्फ ईंट, सीमेंट और सरिया नहीं लगता, बल्कि वर्षों की मेहनत, उम्मीदें और पूरे परिवार के सपने जुड़े होते हैं. लेकिन जब उसी घर को अपने ही हाथों से तोड़ना पड़े, तो सिर्फ दीवारें नहीं गिरतीं, बल्कि इंसान भीतर तक टूट जाता है. उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गोपाल नगर टांडी में इन दिनों कुछ ऐसा ही दर्दनाक मंजर देखने को मिल रहा है. घाघरा नदी का कटान गांव को लगातार निगल रहा है और लोग अपनी जिंदगी की कमाई को बचाने के लिए खुद अपने मकानों को ढहा रहे हैं. घाघरा नदी के तेज कटान ने गांव में भारी तबाही मचा दी है. ग्रामीणों के अनुसार, गोपाल नगर टांड़ी में अब तक 80 से अधिक घर नदी में समा चुके हैं, जिन मकानों तक कटान अभी नहीं पहुंचा है, वहां रहने वाले परिवार भी डर के साये में हैं. सिकंदरपुर से लेकर सुरेमनपुर तक घाघरा तबाही मचा रही है. स्थानीय लोगों के अनुसार, घाघरा के किनारे बसे 200 से अधिक घर नदी में समा चुके है. लोग अपने घरों की ईंटें, दरवाजे, खिड़कियां और छत की टीन निकालकर सुरक्षित जगह पहुंचा रहे हैं, ताकि कम से कम बची हुई सामग्री से कहीं और सिर छिपाने की व्यवस्था की जा सके. गांव की गलियों में हर तरफ हथौड़ों की आवाज सुनाई दे रही है. कोई छत उतार रहा है तो कोई दीवार गिरा रहा है. यह किसी नए मकान के निर्माण की तैयारी नहीं, बल्कि अपनी मेहनत की कमाई को बचाने की आखिरी कोशिश है. जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब घाघरा की तेज धार पहुंचने का इंतजार है. सबसे दर्दनाक तस्वीर उन बुजुर्गों की है, जिन्होंने पूरी जिंदगी मेहनत कर यह घर बनाया था. जिस उम्र में उन्हें परिवार के साथ सुकून से जीवन बिताना चाहिए था, उसी उम्र में वे अपने हाथों से अपने आशियाने की दीवारें गिरा रहे हैं. चेहरों पर बेबसी और आंखों में आंसू साफ दिखाई देते हैं.
घाघरा नदी का रौद्र रूप बलिया के गोपाल नगर टांडी में कहर बरपा, बलिया में 200 से अधिक परिवार बेघर
