झोपड़ी चाहिए तो चार हजार लगेंगे…लहजा तल्ख था और अंदाज कारोबारी..लेना हो तो लो, नहीं तो आगे निकलो, यहां मोलभाव नहीं होता। हमारे सामने सैकड़ों झोपड़ियां थीं और इन्हें बसाने वाले ठेकेदार का गुर्गा सुरेश। भरोसा जीतने के लिए उसने आश्वस्त किया- यहां कोई समस्या नहीं, पुलिस और सरकारी अफसरों को हम समझ लेंगे, हां, बिजली पानी का अलग से देना होगा। हमें इसी कालोनी में एक झोपड़ी की दरकार थी, जिसे उस समानांतर व्यवस्था ने बसा रखा था, जो भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी हुई थी और जिसमें लोग हर झोपड़ी की कीमत देकर बसे हुए थे और संरक्षित थे। सो, हमने चार हजार रुपये दिये और एक झोपड़़ी अपने नाम करवा ली। तीन दिनों की मेहनत के बाद हमें सुरेश की बदौलत यह कब्जा मिल पाया और तब पता चला कि असली झुग्गी माफिया कोई सुधीर है और सुरेश है उसका कारिंदा।
